गुरुवार, 12 मार्च 2015

ज़िन्दगी का गणित


कोण नज़रों का मेरे  सदा सम  रहा
न्यून तो किसी को अधिक वो लगा

घात की घात क्या जान पाये नहीं
हम महत्तम हुए न लघुत्तम कहीं

रेखा हाथों की मेरे कुछ अधिक वक्र थीं
कैसे होती सरल  फ़िर भला ज़िन्दगी

तजुर्बे ज़िन्दगी के कटु-कड़े थे बड़े
सत्य सम प्रमेय सदा सिद्ध होते रहे

कोशिशें की बहुत कुछ यहाँ सीख लूँ
मैं गुणा-भाग, बाक़ी-जमा सीख लूँ

शौक़ ये भी बड़ा कुछ गणित सीख लूँ
जीवन जीने की आसाँ जुगत सीख लूँ

नफ़े के सबक़, ज़ियाँ के फ़लसफ़े
सीख़ पाये न हम ये सबक़ थे कड़े

सर्वसमिका नहीं बैठ पाई कभी
'अचर' ज़िन्दगी का तजरबा यही

समीकरण ज़िन्दगी के बनाते रहे
उफ़ जटिल थे बड़े वे मुए नकचढ़े

पक्ष दोनों कभी ना मिला पाये हम
एक ज़्यादा कभी दूजा होता था कम

गिर्द रिश्तों के आव्यूह बड़े ख़ुशगवार
हर क़दम एक सू, व्यूह थे बेशुमार

ख़याली संख्या से थे ख़ाब मेरे कहीं
साँच की भूमि पर वे न उतरे कभी

रूढ़ संख्या सी जड़ थीं बड़ी रूढ़ियाँ
तोड़ पाएं न हम वे कड़ी बेड़ियां

'मान कर' हल करें सोचा था इस तरह
'मूल' निकले सभी क्यों ग़लत बेतरह

सोचते थे ज़िन्दगी इक सदिश राशि हो
भर दामन मुहौब्बत की धनराशि हो

हो न पाया मगर अब कहूँ और क्या
ज़िन्दगी का गणित है यही फ़लसफ़ा

कम न होती अब ग़म की बारंबारता
शून्य ख़ुशी का समुच्चय सदा ही रहा

शिल्प ना रस है ऐसी ये बनी कविता
है नहीं ज़ीस्त में हो कैसे इसमें भला

फ़िर भी मेरी ख़ुदा से यही है दुआ
ख़ुशियों की बढ़े सबकी प्रायिकता

रचना- निर्दोष कांतेय

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घात- power

प्रमेय- theorem

नफ़ा- लाभ

ज़ियाँ- हानि

अचर- constant

समीकरण- equation

आव्यूह- matrices

सू- evil

ख़याली संख्या- imaginary number

रूढ़ संख्या- prime no.

मूल- mathematical root

ज़ीस्त- life

प्रायिकता- probability

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

माहिया


दिल तोड़ नहीं देना
सोज़ के' सागर में
यूँ छोड़ नहीं देना

क्या शोख़ नज़ारे हैं
पूछ ज़रा दिल से
हम कौन तुम्हारे हैं

हर ओर उदासी है
बोल रहे हैं वो
ये बात ज़रा सी है

मासूम जवानी है
इश्क़ ख़ता कैसी
सबकी ये' कहानी है

ये रात सुहानी है
नींद हुई बैरन
जगते कट जानी है

हैं कौन यहाँ अपने
तोड़ गये सारे
आँखों में छिपे सपने

ये दर्द पुराना है
पर उनका अब भी
इस दिल में' ठिकाना है

उम्मीद भरे नैना
प्रीत लगी तुमसे
दिल तोड़ नहीं देना

ये प्यार नहीं करना
इश्क़ हुआ जब से
अब मुश्किल है जीना

ये क़ातिल हैं रातें
आग लगाती है
बे मौसम बरसातें

- निर्दोष दीक्षित

शनिवार, 24 जनवरी 2015

'कह मुकरी'

बिन उसके मोरि रैन कटै न,
जीवन का अंधियार मिटै न,
उसके बिन मैं जल बिन मछरी,
ए सखि साजन? ना सखि बिजुरी!

लई जावै मोरा परिवार,
मोहे घुमावै हाट बजार,
कभी घुमावै नदी पहाड़ी,
ए सखि साजन? ना सखि गाड़ी!

उसको सोचूं नींद न आवै,
उसकी सुधि ही मन लरजावै,
हर आहट निरखूँ चहुं ओर,
ए सखि साजन? ना सखि चोर!

मैं रखूँ उसको अंग लगाय,
बिनु उसके अब जिया नहिं जाय,
हाथ पकड़ मैं झाड़ूं स्टाइल,
ए सखि साजन?नहिं मोबाइल!

जिसकी सीस छाँह मैं  पाऊँ,
उसकी ओट म लाज बचाऊँ,
पर ऊ मोरे जी का झंझट,
ए सखि साजन?ना सखि घूँघट!

देखा उसको भरे बाज़ार,
एकटुक देखन लगी निहार,
ठिठकी जैसे बिगरी गाड़ी,
ए सखि साजन? ना सखि साड़ी!

रचनाकार- निर्दोष दीक्षित

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काव्य विधा- कह मुकरी छंद

छंद परिचय-

                  यह दो सखियों के बीच का संवाद है जिसमे एक सखी दूसरी सखी से अपने प्रिय की बातें बिना उसका नाम लिए बताती है,जब सखी पूछती है कि क्या तुम अपने साजन की बात कर रही हो तो उसे लाज आती है और वो मुकर जाती है तथा किसी और चीज़ का नाम बता देती है जिसका सम्बन्ध पहले कहे गए कथ्य से होता है।

शिल्प- यह चार पंक्तियों का छंद होता है।
प्रथम तीन पंक्तियों में 16 मात्राएँ तथा अंतिम पंक्ति का मात्रा भार 15,16 या 17 हो सकता है क्योंकि यह उस संज्ञा पर निर्भर करता है जो कही जाती है।

बुधवार, 14 जनवरी 2015

कल्मष धो लें....

आप सभी को मकर संक्रांति की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं

नदी नहीं यह गंगा केवल,
जीवन का आधार यही।

सदियों से इस धरती पर ये,
जग की तारणहार रही।

बहती है भारत में जैसे,
अमृत की कोइ धार बही।

गंग मलिन जो करता उसको,
प्यार नहीं अंगार चही।

गंगा के निर्मल जल सा हम,
अंतस से निर्मल हो लें।

कर्कशता सब त्याग आज हम,
प्यार भरी वाणी बोलें।

अवसर है संक्रांति मकर का,
प्यार फ़िज़ाओं में घोलें।

महापर्व पर महाकुम्भ में,
जीवन का कल्मष धो लें।

रचनाकार- निर्दोष दीक्षित

विधा- लावणी छंद/कुकुभ छंद

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

कथा सुनो शबाब की

   
     कथा सुनो शबाब की
     सवाल की जवाब की
     कली खिली गुलाब की
     बड़े  हसीन  ख़ाब  की

              नया नया विहान था
              घड़ी घड़ी गुमान था
              हसीन सा बहाव था
              जुड़ाव था लगाव था

      तभी विपत्ति आ गई
     तुषार  वृष्टि  छा गई
      बहार को  बहा  गई
      ख़ुमार  हो  हवा गई

              नक़ाब में रक़ीब थे
              सभी वही क़रीब थे
           हमीं बड़े अजीब थे
           हमीं  बड़े  ग़रीब थे
             

रचना- निर्दोष दीक्षित

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काव्य विधा- प्रमाणिका छंद

विधान- लघु गुरु के 4 जोड़े, चार चरण

मात्राभार- (12 12 12 12 )4

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

लालच से जुड़ै न रिस्तेदारी

लरिका अक्याल मिसरा जी का, 
उई बड़े जतन से पालेन।
खान-पान, सिच्छा-दिच्छा मा, 
कमी न कउनौ राखेन।

होनहार लरिका उनका जब, 
लिख-पढ़ि कै तइयार भवा। 
फिर कउनौ सरकारी दफदर मा,
बड़का ओहदेदार भवा।

म्वाछन पर ताव धरे मिसरा जी,
लड्डू सबका बांटेन।
वहिके बाद मुहल्ले मा ना,
फिर कउनौ का गांठेन।

जाने केत्ते बिटिया वाले,
उनके घर का दऊरि परे।
ब्याहै बदि कै लरिका के,
उनके द्वारे आन गिरे।

मिसरा जी अइंठे-अइंठे,
उन सब ते बतलावैं।
दान-दहेज औ लेन-देन के,
ऊँचे दाम लगावैं।

कबहूँ कहैं गाड़ी चौपहिया,
कबहूँ मांगैं बंगला।
तुर्रा उस पे लड़की चाही,
सुन्दर  लक्ष्मी- कमला।

उनके लालच के आगे,
सब के सब मायूस भये।
भूखे सियार सा देखि के उनको,
बिटिया वाले लऊटि गये।

अइसे मा याकै सुकला जी,
उनके द्वारे आये।
म्वाछैं अइंठत मिसरा जी,
फिर वहै राग फइलाये।

सुकला जी मुस्का के बोले,
सुनौ बात मिसरा जी।
लेन देन औ दान दहेज,
हर बात पे हम हन राजी।

जइसे जउन जहाँ जो चहिहौ,
वइसै सब कुछ होई।
स्वागत, खान-पान से लइके,
कमी न कउनौ होई।

आगे बोले- द्याखौ भइया,
हर बात तुम्हारी मानी।
पर याक बात हमरी तुम मानौ,
तौ तुमका हम जानी।

लबराने मिसरा जी मुस्काये,
बातन में मिसरी घोले।
बात आपकी मानब हमहूँ,
बड़े जोर से बोले।

सुकला बोले बाद बिहाव के,
लरिका हमरे घर आई।
अपनी प्यारी बिटिया खातिर हम,
लइबै घर का जंवाई।

बिदकि परे सुनि कै मिसरा जी,
यू कइसे होइ पाई?
लरिका अक्याल,लाठी बुढ़पन की,
तुम्हरे घर कइसे जाई?

सुकुल कहेन, मुँहमांग दाम हम,
जउनी चीज का द्याबै।
फिर काहे ना वहिका हम,
अपने घर लई जाबै?

लरिका तुमका प्यारा है तौ,
बिटिया हमका प्यारी है।
लरिका कुल का दीपक है तौ,
बिटिया घर उजियारी है।

गइया भइंसी, लरिका बिटियन मा,
कुछ तौ अंतर होन चही।
अपने ई लरिका बिटिया,
कउनौ लकड़ी-लोन नहीं।

पबित्र बंधन सादी- बिहाव,
एहिमा सउदेबाजी ठीक नहीं।
तुमहीं कहौ हम कहेन ठीक या 
कउनौ गन्दी बात कही।

सिटपिटान मिसरा जी एकदम,
गहिरी सोच म' परि गे।
भाव बदलि गे चेहरे के औ,
दीदा उनके भरि गे।

भरे गले से बोले-सुकला जी,
भै गलती हमसे भारी।
धन्नबाद, मानित है, लालच से,
जुड़ै न रिस्तेदारी।

रचना-  निर्दोष दीक्षित

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

नशा सा हुआ...

महाभुजंगप्रयात सवैया छंद

नशा सा हुआ है तुझे देखके यूँ,
सुरापान जैसे कि मैंने किया है।

बुरा काम तूने किया है सुनैना,
ख़ुदारा हमारा चुराया जिया है।

मुझे प्यार से देख लो आज भी तो,
खड़ा सामने ये तुम्हारा पिया है।

ख़ुदा की रही ख़ूब "निर्दोष" मर्ज़ी,
वफ़ा का दिलों में जलाया दिया है।

- निर्दोष दीक्षित

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

आल्हा या वीर छंद

प्रेम भाव और सत्य अहिंसा, नीति हमारी रही महान 
विश्व बन्धु है हम यह कहते,सदा चले हम ऐसा मान

छेड़ा हमको किन्तु किसी ने, तो उसकी आफ़त में जान
यम सम बनकर टूट पड़ें जो, ऐसे अपने वीर जवान

एक पड़ोसी अपना ऐसा, जो समझो पूरा शैतान
करे सदा नापाक हरकतें, नाम धरे है पाकिस्तान

सन इकहत्तर था जब उसने, काम किया ऐसा उद्दंड 
ललकारा सीमा पर उसने, रण भीषण तब हुआ प्रचंड

सबक़ सिखाया ऐसा हमने, और दिया तब ऐसा दंड
क़ैद किये तब बैरी सारे, देश कर दिया खंड-विखंड

वीर जवानों ने तब अपने, युद्ध मचाया था घमसान 
रिपुदल सगरे पस्त हो गए, और पड़े मुश्किल में प्रान

होली अरि शोणित से खेलें, बाज़ी अपनी जान लगाय
कम न पड़े तब सीने अपने, भले गोलियाँ कम पड़ जाय

शूर महा अपने वीरों ने, प्राण किये हँसकर क़ुर्बान
लाल देश के सच्चे हैं ये, शान हमारी वीर जवान



( शिल्प- 16-15 पर यति पदांत गुरु-लघु )

©रचना- निर्दोष दीक्षित

सोमवार, 17 नवंबर 2014

एक विजया घनाक्षरी



प्रीत है पुनीत रीत,  गाओ मीत प्रेम- गीत
भीत-भय त्याग कर, सुप्रेम वृष्टि कीजिये

अंग-अंग रंग भर, मन में  उमंग भर
तरंग ढंग ले नई, नवीन सृष्टि कीजिये

मानकर प्रथा यथा, व्यथा कथा न हो वृथा 
हूँ न कुछ न था कभी, दया सुदृष्टि कीजिये

चित्र है विचित्र मित्र, लोग भेद भाव लिप्त
मातृभूमि के निमित्त, अब समष्टि कीजिये

                   - निर्दोष दीक्षित

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2014

एक विनती माँ से...

पूजन अर्चन  वंदन है  नित भक्त  सभी अब  मात पुकारें 


रिद्धि व सिद्धि प्रदायक माँ करके किरपा मम द्वार पधारें


प्रेम   प्रकाश  यहाँ  बिखरे  सबके मन-मंदिर  दीपक  बारें


मानव  रक्त  पिपाषु बना  उसके अब तो  सब कर्म सुधारें

                                                        
                                                       -निर्दोष दीक्षित

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

अमर शहीदों के लिए...

कुछ याद उन्हें भी कर लो
जो लौट के घर ना आये..... 
जो लौट के घर ना आये...


आँखों में आँसू, ज़ेहन में कितने सवाल लाया है
आज तिरंगे में लिपटा किसी का लाल आया है

राहें उसकी तकते तकते, बूढ़ी आँखें पथराई होंगी
उसे सुलाने को माँ ने कभी लोरियां गाई होंगी
उसकी तुतली बोली पर सब कुछ वार दिया होगा
उसको भी तो माँ ने ख़ुद से ज़्यादा प्यार किया होगा
उस माँ के मन में आज वही बनके भूचाल आया है
आज तिरंगे में लिपटा किसी का लाल आया है

उसने भी अपनी गोरी से वादे तमाम किये होंगे
कुछ साल ज़िन्दगी के रंगीं उसके नाम किये होंगे
दफ़्न हुई आवाज़ कहीं औ सुर साज रूठे होंगे
कितने वादे कितने सपने कहीं आज टूटे होंगे
किन्तु प्रतिज्ञा पूरी करके वो कर कमाल आया है
आज तिरंगे में लिपटा किसी का लाल आया है

उसकी गुड़िया सी गुड़िया आँगन में तो खेलेगी
पर इस दुनिया के तूफ़ाँ जाने वो कैसे झेलेगी
अपने प्यारे बिट्टू को प्यारी फटकार लगाई होगी
उसने अपने पापा से चिठ्ठी में कार मंगाई होगी
पर हाय हाय कैसा समय का ये कुचाल आया है
आज तिरंगे में लिपटा किसी का लाल आया है
नहीं नहीं ये तो अपने देश का लाल आया है
वीर शहीदों की अमर थाती संभाल आया है
मात भारती का ऊँचा ये करके भाल आया है
शत शत नमन है ये अपने देश का लाल आया है।

रचना- निर्दोष दीक्षित
तिथि- 09.10.2014

सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

रंग ज़िंदगी के....

गांठें ही गांठें हों जिसमें ऐसे बंधन देख लिए
कांटे ही कांटे हों जिसमें ऐसे दामन देख लिए

प्यार की दिलकश म्यानों में नफ़रत की शमशीर यहाँ
शिफ़ा के नाम पे ज़ख्म कुरेदे ऐसे मरहम देख लिए

उन्स वफ़ा के गुलशन में खिलते फूल अज़ाबों के
तेज़ाबी बारिश के मैंने ऐसे सावन देख लिए

लिखा किताबों में पाया ना मुर्शिद ने बतलाया था
ख़ून बहा दे सीने का अब ऐसे मौसम देख लिए

रिश्तों की लाशों को कैसे नोच नोच के खाते हैं
बिलकुल गिद्ध के जैसे हों ऐसे दुर्जन देख लिए

टूट गए बेआवाज़ वो कब औ ज़र्रा ज़र्रा बिखर गए
मैंने अपने घर के लुटते कितने ऐसे बर्तन देख लिए

श्री हनुमान जी के चरणों में

राम जहाँ हनुमान वहीं  भवसागर  तारण  हार  वही हैं


राम कृपा नित पात्र वही  नित जो हनुमंत दुआर वही हैं


काय महा छवि है जिनकी शिव शंकर के अवतार वही हैं


भक्त शिरोमणि राम सखा सम जीवन में करतार वही हैं

... क्यों नहीं होता

तन आज़ाद तो मन क्यूँ आज़ाद नहीं होता

प्रेम सद्भाव जहाँ में क्यूँ बुनियाद नहीं होता


देश के सीने पे ख़ंजर चलाने वालों को अब

बलिदान शहीदों का क्यूँ याद नहीं होता



जाने बुलबुलें कितनीं रोज़ दम तोड़ती यहाँ

ज़ालिम सैयाद ही क्यूँ बर्बाद नहीं होता


हर तरफ़ हैं नफ़रतें, हर तरफ़ रुसवाइयां

गुलशन मुहौब्बत का क्यूँ आबाद नहीं होता

दो कुंडलिया छंद

बिना  विचारे  कीजिये, मत  कोई  भी काम
मस्त चित्त निज राखिये, जीवन में आराम
जीवन   में   आराम,  बंसी   चैन   की  बाजै
सुखी   रहे   परिवार,  मुख   मुस्कान  छाजै
कहते   कवि   निर्दोष,  रहो  प्रभु  राम सहारे
खोया  धन सम्मान, किया  जो बिना विचारे




सोना  चाँदी धारिये,  तन  को जो  चमकाय
रखिये सुघर विचार तो, मन कंचन हो जाय
मन कंचन हो जाय, चमक  दुनिया  में फैले
मीठे  वो  हो   जांय,   जो   कड़वे  हैं  कसैले
कहते  कवि निर्दोष ,  मनुज है वही सलोना
सुविचारी  नरश्रेष्ठ,  जगत  में सच्चा सोना

शनिवार, 24 मई 2014

मुहौब्बत कर गुज़र जाइये....

इस तरह तनहा न हमें छोड़कर जाइये
सुकूं मिलता हो पहलू में तो ठहर जाइये

त'आर्रुफ़ है नया,मुलाक़ात चंद लम्हों की
धीरे-धीरे आप यूँ ही दिल में उतर जाइये

ग़ज़लें भी होंगी, गीत और रुबाई भी
कभी मेरी महफ़िल में भी नज़र आइये

ज़िन्दगी बुलाती है तो जाइये बड़े शौक़ से

मगर दुवाएं भी मेरी साथ लेकर जाइये

मुश्किल हैं नफ़रतें, दिल जलाती हैं
इक बार मुहौब्बत भी कर गुज़र जाइये

गुरुवार, 6 मार्च 2014

चुनावी मौसम

कर कमल को हमारे 'कर-कमल' ने मरोड़ा है
तोड़ा किसी ने भी हो मगर दिल तो तोड़ा है

तप रहे हैं हम सुर्ख़ लाल फ़ौलाद से
क्या करें मगर उनके हाथ में हथौड़ा है

हिन्दू-मुस्लिम कभी वर्ग-ज़ात-भाषा के नाम पर
बंट गया मुल्क़,हमको कहीं का न छोड़ा है

हमने ख़ुद ही बना ली हैं अपनी अपनी सरहदें
यही कामयाबी उनकी औ अपनी राह का रोड़ा है

मुहौब्बत की राह पे, इल्म-ओ-अमन की बातें
रुख़ हवाओं का जहां में इन्हीं बातों ने मोड़ा है

जब भी आता है मस्त करके वार करता है
रहना होशियार, ये मौसम बड़ा निगोड़ा है

शनिवार, 16 नवंबर 2013

बात इतनी समझिये...

अब देर समझिये और बस अंधेर समझिये
समझते हों तो क़िस्मत का फेर समझिये

समझ न आयेंगे ये सियासत के पेच-ओ-ख़म 
पीटिये तालियाँ,किसी ऊँचे शायर का शे'र समझिये

आतिश हो सीनों में चाहे जितनी दफ़न यारों
भड़केगी नहीं, सीली हुई बारूद का बस ढेर समझिये

अपने क़ातिल को लाते हैं ख़ुद सरताज बनाकर
बात इतनी समझिये भले देर-सवेर समझिये

चल रहा है भरम में जीने का चलन कुछ ऐसा
मारिये चीटियाँ और ख़ुद को दिलेर समझिये

इस दौर में जो चाहिए सर-ज़र की सलामती
रखिये शक़ की नज़र औ सेर को सवा सेर समझिये

दुआ होती है क़ुबूल ग़र मर्ज़ी हो ख़ुदा की
इस दिल में ही काशी और अजमेर समझिये

रविवार, 29 सितंबर 2013

मेरे प्रियवर ओ मेरे प्रियवर....

डगर डगर तम नगर नगर

घर घर, दर दर आडम्बर

कर कृपाण अब धारण कर

युग रचो नया, नव संवत्सर

मेरे प्रियवर ओ मेरे प्रियवर....



कुल काक कंठ, कुल कोकिल स्वर

भयभीत फिरें कुल बन कायर

उठ जाग वीर, बन नर नाहर

संधानो अरि मस्तक पर  शर

मेरे प्रियवर ओ मेरे प्रियवर....



बरस, मास, दिन, आठ पहर

जीवन व्यर्थ यदि जिया डरकर

भय त्याग, न अब तू और ठहर

पग बढ़ा अरे! संघर्ष पथ पर

मेरे प्रियवर ओ मेरे प्रियवर....


कर विदा निशा संग रजनीचर

आगंतुक रवि की रश्मि प्रखर

स्फूर्त उमंगें उर में भरकर

राह पकड़ कोई नई डगर

मेरे प्रियवर ओ मेरे प्रियवर....


रविवार, 12 मई 2013

मातृदिवस पर...

मित्रों आज मातृदिवस है, वर्ष में कई प्रकार के दिवस मनाये जाते है जैसे महिला दिवस, पितृ दिवस आदि. वास्तव में इस प्रकार से दिवस मनाने की हमारी संस्कृति नहीं है, यह उधार की संस्कृति है या यूँ कहें कि संस्कृतियों के संक्रमण का प्रभाव है, यह वहाँ की संस्कृति है जहाँ लोग वर्ष भर अपनी व्यस्त, संवेदनहीन और भौतिकतापूर्ण जीवनचर्या में रमे रहते हैं और साल में एक दिन इस तरह के दिवस मनाकर अपने कर्तव्यों कि इति कर लेते हैं...
हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता है हमारी संस्कृति में हमेशा सिखाया गया है कि माता-पिता ईश्वर के सदृश होते हैं और हम वर्ष में एक दिन नहीं पूरे वर्ष भर उनको सम्मान देते हैं और माता-पिता का अगाध प्रेम, आशीष और वरदहस्त हमें सदा सुलभ रहता है... ऐसी संस्कृति ही क्या जहाँ साल में एक दिन उनका दिवस मनाने की आवश्यकता पड़े .... हमारे यहाँ नारियों को भी देवी का दर्जा दिया गया है और यह हमारे सांस्कृतिक प्रदूषण का ही असर है जो हमें भी महिला दिवस मनाने की आवश्यकता आन पड़ी... वास्तव में आधुनिकता के इस दौर में या छद्म रूप से आधुनिक दिखने के प्रयास में हमने यह संक्रमण स्वयं आत्मसात किया है.... और समाज के सभी वर्ग इसके लिए ज़िम्मेदार हैं...
फ़िर भी मैं समझता हूँ हमारी संस्कृति अक्षुण्ण है... हमारे यहाँ माता-पिता का देवत्व क़ायम रहेगा और हम साल में सिर्फ़ एक दिन नहीं बल्कि उनको साल भर.... जीवन भर पूजते रहेंगे... यक़ीनन अपवाद होंगे लेकिन उनकी संख्या बहुत कम होगी, आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग अपने माता-पिता को देवतुल्य ही मानता है.... कार्य-व्यवसाय/आजीविका के कारण शारीरिक दूरी भले ही हो गई हो लेकिन आत्मा माता-पिता के चरणों में ही रहती है.... माँ के आँचल की छाँव उन्हें वहाँ भी महसूस होती है....
मित्रों कुछ समय पूर्व की एक रचना आप लोगों के समक्ष रख रहा हूँ उम्मीद है पसंद आएगी...

आओ लौट चलें...
'''''''''''''''''''''''''''''''''

अपना चश्मा ही रंगीन था,किससे गिला करें...
ज़िन्दगी तलाशते रहे इन बे-रंग फ़ज़ाओं में

धूप बड़ी सख़्त है कमबख़्त, चलो चलें…
उसी बूढ़े से दरख्त की छांवमें

आओ लौट चलें, बस्तियाँ बसा लें...
फ़िर से अपने उजड़े गाँव में

फ़क़त तन्हाई है,तीरगी है...
इस शहर की कांव-कांव में

है कहीं बाद-ए-सबा तो माँ के आँचल में...
थक गया हूँ इन गरम हवाओं में

पता ही ग़लत दे गए जन्नत का नामुराद...
अरे.. वो तो यहीं थी मेरी माँ में पावों में............. 


***तीरगी-:अँधेरा, बाद-ए-सबा -:सुबह की ताज़ी हवा