शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

बाज़ारवाद और स्त्री













''हम हैं मता-ए- कूचा औ बाज़ार की तरह, 
 उठती है हर निग़ाह  ख़रीदार  की तरह!"
 ( मता = सामानवस्तुचीज़माल)
    
     पाकिस्तान में कथित तौर पर एक सांसद की अध्यक्षता में आयोजित एक कबायली परिषद ने दो कबीलों के बीच विवाद सुलझाने के लिए मुआवजे के तौर पर 13 नाबालिग लड़कियां देने का अजब फैसला सुनाया।
     

     कबायली परिषद या जिरगा की अध्यक्षता सांसद मीर तारिक मसूरी ने सितंबर बलूचिस्तान के डेरा बुगती जिले में की। इस जिरगा में विवादास्पद वानी परंपरा के तहत दो कबायली समूहों के बीच विवाद सुलझाने के लिए साल से 16 साल की 13 लड़कियों को देने का फैसला किया गया।
     

     एक ज़माना था जब कमज़ोर शासक अपने से शक्तिशाली शासक के हमले से बचने के लिए या उसे ख़ुश करने के लिए लड़कियां/स्त्रियाँ भेंट स्वरुप दिया करते थे जो शक्तिशाली शासक के हरम की शोभा बढ़ाती थीं। कुछ शासक अपने राज्य की सुरक्षा और मैत्री के उद्देश्य से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि प्राचीन काल से ही स्त्रियों का महज़ वस्तु की तरह प्रयोग होता था। आज 21वीं सदी में भी परिवेश कमोबेश वैसा ही है। आज आधुनिक युग मेंविकास के इस दौर में स्त्री को प्रयोग करने के तौर- तरीक़ों में भी विकास कर लिया गया है, मूल तत्व वही है- ''''वस्तु के रूप में प्रयोग''''     

     आज बाज़ारवाद के दौर में जायज़- नाजायज़ कोई भी हथकंडा अपनाकर उत्पाद बेचना एक तरह से सामाजिक स्वीकार्यता प्राप्त कर चुका है। एक ग़रीब सब्ज़ी बेचने वाला 10 रूपए किलो वाली बासी सब्ज़ी को ताज़ी कहकर बेचता है तो हम उससे झंझट करने को तैयार रहते है। वहीँ किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति/सेलेब्रिटी के उकसावे पर 10 रूपए की मामूली क्रीम ख़ुशी- ख़ुशी 100 रूपए में लाकर बदन पर घिसते हैं। सब्ज़ी वाले और उस प्रतिष्ठित व्यक्ति में फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि सब्ज़ी बेचने वाला झूठ बोलकर पैसा लेता है और वह महान शख्श पैसा लेकर झूठ बोलता है। सब्ज़ी वाले की आजीविका का प्रश्न है... लेकिन प्रतिष्ठित व्यक्ति की आजीविका का प्रश्न नहीं है इसलिए मैं उसे दोषी मानता हूँ.... लेकिन उसकी इस हिमाक़त को समाज की सहमति प्राप्त है... कोई इस बारे में नहीं सोचता....
     

     बाज़ारवाद के इस दौर में एक बदलाव और हुआ है... बाज़ार ने स्त्री की आकर्षक/सुन्दर छवि को उत्पाद बेचने के लिए एक ज़बरदस्त उपकरण/टूल के रूप में विकसित कर लिया है। इसी लिए पुरुषों के सेफ़्टी-रेज़र के विज्ञापन में महिला दिखाई जाती है। आप deodorant इसलिए लगाइए ताकि अनेक महिलायें कामुक ढंग से इठलाते हुए आपके शरीर में आकर बिंध जाएँ। आप पुरुषों की गोरेपन की क्रीम इसलिए लगाइए ताकि अनेकों ख़ूबसूरत जवान लड़कियां दीवानी होकर आपके पीछे भागने लगेंआप फलां बनियान पहनें तो लड़की आपसे जोंक की तरह चिपक जाएगी.... क्या बेहूदा मज़ाक़ है....???    
     मज़े की बात तो यह है कि इन सब बातों को समाज ने न सिर्फ़ स्वीकार कर लिया है बल्कि प्रभावित भी होता हैं.... और विरोध का कोई स्वर यहाँ तक कि महिलाओं की तरफ़ से भी नहीं सुनाई पड़ता, भले ही इन सब से महिलाओं की क्या छवि समाज में प्रोजेक्ट होती हो। मुझे नहीं लगता कि कोई भी महिला किसी व्यक्ति के शरीर की ख़ुशबू सूंघकर उससे बिंध जाए, किसी के गोरेपन को देखकर उसके पीछे दौड़ पड़े.....
     इस सब का एक पहलू यह भी है कि पुरुष की मानसिकता क्या है...क्या वह ऐसा ही कुछ चाहता है?... क्या उसके मन की इच्छाओं की क्षुधा-पूर्ति इन विज्ञापनों के ज़रिये होती है या यह विज्ञापन पुरुष मानसिकता के दर्पण हैं??.... क्या पुरुष इतने भोंदू हैं जो ऐसे अतिशयोक्तिपूर्ण विज्ञापनों से प्रभावित होते हैं?.... यदि ऐसा है तो यह सोचनीय है.... ""alarming condition"" है.... 

1 टिप्पणी:

  1. वाह साहब मान गए, सचमुच ये बाजारवाद ही है जो अब समाज के हर व्यक्ति के सर चढ़ कर बोल रहा है, चाहे वो सुबह की चाय हो या रात को सोने के लिए इस्तेमाल में आने वाला मत्रेस हो, चाहे वो पहनने के लिए कपडे हो या उन्हें धोने के लिए डिटर्जेंट पाउडर, चाहे वो दांतों को साफ़ करने का दंत्मजन हो या फिर मुह धोने का साबुन सब बाजारवाद के ही पूरक हैं, जो हम सबकी मानसिकताओं पैर हावी हुए जा रहे हैं.........

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