शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

कथा सुनो शबाब की

   
     कथा सुनो शबाब की
     सवाल की जवाब की
     कली खिली गुलाब की
     बड़े  हसीन  ख़ाब  की

              नया नया विहान था
              घड़ी घड़ी गुमान था
              हसीन सा बहाव था
              जुड़ाव था लगाव था

      तभी विपत्ति आ गई
     तुषार  वृष्टि  छा गई
      बहार को  बहा  गई
      ख़ुमार  हो  हवा गई

              नक़ाब में रक़ीब थे
              सभी वही क़रीब थे
           हमीं बड़े अजीब थे
           हमीं  बड़े  ग़रीब थे
             

रचना- निर्दोष दीक्षित

_________________________________

काव्य विधा- प्रमाणिका छंद

विधान- लघु गुरु के 4 जोड़े, चार चरण

मात्राभार- (12 12 12 12 )4

4 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (11-01-2015) को "बहार की उम्मीद...." (चर्चा-1855) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुंदर प्रविष्टि !!! सुंदर रचना ...

    उत्तर देंहटाएं