शनिवार, 24 जनवरी 2015

'कह मुकरी'

बिन उसके मोरि रैन कटै न,
जीवन का अंधियार मिटै न,
उसके बिन मैं जल बिन मछरी,
ए सखि साजन? ना सखि बिजुरी!

लई जावै मोरा परिवार,
मोहे घुमावै हाट बजार,
कभी घुमावै नदी पहाड़ी,
ए सखि साजन? ना सखि गाड़ी!

उसको सोचूं नींद न आवै,
उसकी सुधि ही मन लरजावै,
हर आहट निरखूँ चहुं ओर,
ए सखि साजन? ना सखि चोर!

मैं रखूँ उसको अंग लगाय,
बिनु उसके अब जिया नहिं जाय,
हाथ पकड़ मैं झाड़ूं स्टाइल,
ए सखि साजन?नहिं मोबाइल!

जिसकी सीस छाँह मैं  पाऊँ,
उसकी ओट म लाज बचाऊँ,
पर ऊ मोरे जी का झंझट,
ए सखि साजन?ना सखि घूँघट!

देखा उसको भरे बाज़ार,
एकटुक देखन लगी निहार,
ठिठकी जैसे बिगरी गाड़ी,
ए सखि साजन? ना सखि साड़ी!

रचनाकार- निर्दोष दीक्षित

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काव्य विधा- कह मुकरी छंद

छंद परिचय-

                  यह दो सखियों के बीच का संवाद है जिसमे एक सखी दूसरी सखी से अपने प्रिय की बातें बिना उसका नाम लिए बताती है,जब सखी पूछती है कि क्या तुम अपने साजन की बात कर रही हो तो उसे लाज आती है और वो मुकर जाती है तथा किसी और चीज़ का नाम बता देती है जिसका सम्बन्ध पहले कहे गए कथ्य से होता है।

शिल्प- यह चार पंक्तियों का छंद होता है।
प्रथम तीन पंक्तियों में 16 मात्राएँ तथा अंतिम पंक्ति का मात्रा भार 15,16 या 17 हो सकता है क्योंकि यह उस संज्ञा पर निर्भर करता है जो कही जाती है।

6 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (26-01-2015) को "गणतन्त्र पर्व" (चर्चा-1870) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    गणतन्त्रदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति, गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाये।

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  3. हार्दिक आभार राजेंद्र जी, आपको भी गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  4. सुन्दर मुकरियाँ पढ़ कर बहुत ही आनंद आया ,अच्छी अभिव्यक्ति के लिए धन्यवाद

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