गुरुवार, 8 जनवरी 2015

लालच से जुड़ै न रिस्तेदारी

लरिका अक्याल मिसरा जी का, 
उई बड़े जतन से पालेन।
खान-पान, सिच्छा-दिच्छा मा, 
कमी न कउनौ राखेन।

होनहार लरिका उनका जब, 
लिख-पढ़ि कै तइयार भवा। 
फिर कउनौ सरकारी दफदर मा,
बड़का ओहदेदार भवा।

म्वाछन पर ताव धरे मिसरा जी,
लड्डू सबका बांटेन।
वहिके बाद मुहल्ले मा ना,
फिर कउनौ का गांठेन।

जाने केत्ते बिटिया वाले,
उनके घर का दऊरि परे।
ब्याहै बदि कै लरिका के,
उनके द्वारे आन गिरे।

मिसरा जी अइंठे-अइंठे,
उन सब ते बतलावैं।
दान-दहेज औ लेन-देन के,
ऊँचे दाम लगावैं।

कबहूँ कहैं गाड़ी चौपहिया,
कबहूँ मांगैं बंगला।
तुर्रा उस पे लड़की चाही,
सुन्दर  लक्ष्मी- कमला।

उनके लालच के आगे,
सब के सब मायूस भये।
भूखे सियार सा देखि के उनको,
बिटिया वाले लऊटि गये।

अइसे मा याकै सुकला जी,
उनके द्वारे आये।
म्वाछैं अइंठत मिसरा जी,
फिर वहै राग फइलाये।

सुकला जी मुस्का के बोले,
सुनौ बात मिसरा जी।
लेन देन औ दान दहेज,
हर बात पे हम हन राजी।

जइसे जउन जहाँ जो चहिहौ,
वइसै सब कुछ होई।
स्वागत, खान-पान से लइके,
कमी न कउनौ होई।

आगे बोले- द्याखौ भइया,
हर बात तुम्हारी मानी।
पर याक बात हमरी तुम मानौ,
तौ तुमका हम जानी।

लबराने मिसरा जी मुस्काये,
बातन में मिसरी घोले।
बात आपकी मानब हमहूँ,
बड़े जोर से बोले।

सुकला बोले बाद बिहाव के,
लरिका हमरे घर आई।
अपनी प्यारी बिटिया खातिर हम,
लइबै घर का जंवाई।

बिदकि परे सुनि कै मिसरा जी,
यू कइसे होइ पाई?
लरिका अक्याल,लाठी बुढ़पन की,
तुम्हरे घर कइसे जाई?

सुकुल कहेन, मुँहमांग दाम हम,
जउनी चीज का द्याबै।
फिर काहे ना वहिका हम,
अपने घर लई जाबै?

लरिका तुमका प्यारा है तौ,
बिटिया हमका प्यारी है।
लरिका कुल का दीपक है तौ,
बिटिया घर उजियारी है।

गइया भइंसी, लरिका बिटियन मा,
कुछ तौ अंतर होन चही।
अपने ई लरिका बिटिया,
कउनौ लकड़ी-लोन नहीं।

पबित्र बंधन सादी- बिहाव,
एहिमा सउदेबाजी ठीक नहीं।
तुमहीं कहौ हम कहेन ठीक या 
कउनौ गन्दी बात कही।

सिटपिटान मिसरा जी एकदम,
गहिरी सोच म' परि गे।
भाव बदलि गे चेहरे के औ,
दीदा उनके भरि गे।

भरे गले से बोले-सुकला जी,
भै गलती हमसे भारी।
धन्नबाद, मानित है, लालच से,
जुड़ै न रिस्तेदारी।

रचना-  निर्दोष दीक्षित

2 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (10-01-2015) को "ख़बरची और ख़बर" (चर्चा-1854) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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