बुधवार, 7 नवंबर 2012

सियासी दोहे


"राजनीतिक दल"


अलग सा इनका रंग है, अलग सी इनकी चाल 
रैपर अलग है माना, अन्दर एक ही माल.....
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''सियासी प्रतिस्पर्धा''


उसका घोटाला मेरे घोटाले से बड़ा क्यूँ है?
मैं 'गिर' गया, फिर वो साला खड़ा क्यूँ है?

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''मातृभूमि प्रेम''


नेता-अफ़सर मातृभूमि से, करते प्रेम अथाह 
सोते-जगते, निश दिन करें, मात्र भूमि की चाह।
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''सबसे बेहतरीन जवाब''


चोरी करो शान से, ख़ूब उड़ाओ माल......
जवाब देने लायक़ नहीं जो पूछे कोई सवाल"
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''अनेकता में एकता''


तुम भी नेता, हम भी नेता; है अपना एक स्वभाव
जितना देश तुम्हारा,मेरा;आओ मिल-बाँटकर खाओ।
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   ''लोकतंत्र''

      लोकतंत्र में बन रहे जनता के सिरमौर।
     ऊँची कुर्सी पा रहे देखो कुर्सी चोर ।।
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9 टिप्‍पणियां:

  1. अय्यासी में हैं रमे, रोम रोम हे राम |
    बने सियासी सोच से, सारे बिगड़े काम |

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    1. अय्यासी में हैं रमे, रोम रोम हे राम |
      बने सियासी सोच से, सारे बिगड़े काम |

      सारे बिगड़े काम, मातृभू की सेवा ।

      मंझा माफिया मिला, भूमि से करे कलेवा ।

      कोयला खनि के बेंच, कहीं बालू की राशी ।

      मिले यही पर स्वर्ग, मरे क्यूँ जाकर काशी ।।

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    2. बहुत बढ़िया रविकर जी.... धन्यवाद स्वीकारें.

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  2. उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

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