रविवार, 29 सितंबर 2013

मेरे प्रियवर ओ मेरे प्रियवर....

डगर डगर तम नगर नगर

घर घर, दर दर आडम्बर

कर कृपाण अब धारण कर

युग रचो नया, नव संवत्सर

मेरे प्रियवर ओ मेरे प्रियवर....



कुल काक कंठ, कुल कोकिल स्वर

भयभीत फिरें कुल बन कायर

उठ जाग वीर, बन नर नाहर

संधानो अरि मस्तक पर  शर

मेरे प्रियवर ओ मेरे प्रियवर....



बरस, मास, दिन, आठ पहर

जीवन व्यर्थ यदि जिया डरकर

भय त्याग, न अब तू और ठहर

पग बढ़ा अरे! संघर्ष पथ पर

मेरे प्रियवर ओ मेरे प्रियवर....


कर विदा निशा संग रजनीचर

आगंतुक रवि की रश्मि प्रखर

स्फूर्त उमंगें उर में भरकर

राह पकड़ कोई नई डगर

मेरे प्रियवर ओ मेरे प्रियवर....


3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (30-09-2013) गुज़ारिश खाटू श्याम से :चर्चामंच 1399 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    हिन्दी पखवाड़े की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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