रविवार, 12 मई 2013

मातृदिवस पर...

मित्रों आज मातृदिवस है, वर्ष में कई प्रकार के दिवस मनाये जाते है जैसे महिला दिवस, पितृ दिवस आदि. वास्तव में इस प्रकार से दिवस मनाने की हमारी संस्कृति नहीं है, यह उधार की संस्कृति है या यूँ कहें कि संस्कृतियों के संक्रमण का प्रभाव है, यह वहाँ की संस्कृति है जहाँ लोग वर्ष भर अपनी व्यस्त, संवेदनहीन और भौतिकतापूर्ण जीवनचर्या में रमे रहते हैं और साल में एक दिन इस तरह के दिवस मनाकर अपने कर्तव्यों कि इति कर लेते हैं...
हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता है हमारी संस्कृति में हमेशा सिखाया गया है कि माता-पिता ईश्वर के सदृश होते हैं और हम वर्ष में एक दिन नहीं पूरे वर्ष भर उनको सम्मान देते हैं और माता-पिता का अगाध प्रेम, आशीष और वरदहस्त हमें सदा सुलभ रहता है... ऐसी संस्कृति ही क्या जहाँ साल में एक दिन उनका दिवस मनाने की आवश्यकता पड़े .... हमारे यहाँ नारियों को भी देवी का दर्जा दिया गया है और यह हमारे सांस्कृतिक प्रदूषण का ही असर है जो हमें भी महिला दिवस मनाने की आवश्यकता आन पड़ी... वास्तव में आधुनिकता के इस दौर में या छद्म रूप से आधुनिक दिखने के प्रयास में हमने यह संक्रमण स्वयं आत्मसात किया है.... और समाज के सभी वर्ग इसके लिए ज़िम्मेदार हैं...
फ़िर भी मैं समझता हूँ हमारी संस्कृति अक्षुण्ण है... हमारे यहाँ माता-पिता का देवत्व क़ायम रहेगा और हम साल में सिर्फ़ एक दिन नहीं बल्कि उनको साल भर.... जीवन भर पूजते रहेंगे... यक़ीनन अपवाद होंगे लेकिन उनकी संख्या बहुत कम होगी, आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग अपने माता-पिता को देवतुल्य ही मानता है.... कार्य-व्यवसाय/आजीविका के कारण शारीरिक दूरी भले ही हो गई हो लेकिन आत्मा माता-पिता के चरणों में ही रहती है.... माँ के आँचल की छाँव उन्हें वहाँ भी महसूस होती है....
मित्रों कुछ समय पूर्व की एक रचना आप लोगों के समक्ष रख रहा हूँ उम्मीद है पसंद आएगी...

आओ लौट चलें...
'''''''''''''''''''''''''''''''''

अपना चश्मा ही रंगीन था,किससे गिला करें...
ज़िन्दगी तलाशते रहे इन बे-रंग फ़ज़ाओं में

धूप बड़ी सख़्त है कमबख़्त, चलो चलें…
उसी बूढ़े से दरख्त की छांवमें

आओ लौट चलें, बस्तियाँ बसा लें...
फ़िर से अपने उजड़े गाँव में

फ़क़त तन्हाई है,तीरगी है...
इस शहर की कांव-कांव में

है कहीं बाद-ए-सबा तो माँ के आँचल में...
थक गया हूँ इन गरम हवाओं में

पता ही ग़लत दे गए जन्नत का नामुराद...
अरे.. वो तो यहीं थी मेरी माँ में पावों में............. 


***तीरगी-:अँधेरा, बाद-ए-सबा -:सुबह की ताज़ी हवा

5 टिप्‍पणियां:

  1. पता ही ग़लत दे गए जन्नत का नामुराद...
    अरे.. वो तो यहीं थी मेरी माँ में पावों में.............
    ऐसी रचनाये सदा नवीन होती है खुबसूरत दिल के करीब

    उत्तर देंहटाएं
  2. सच कहा है ... माँ के आँचल की छाँव सदा रहती है ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल १४ /५/१३ मंगलवारीय चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है ।

    उत्तर देंहटाएं