शनिवार, 16 नवंबर 2013

बात इतनी समझिये...

अब देर समझिये और बस अंधेर समझिये
समझते हों तो क़िस्मत का फेर समझिये

समझ न आयेंगे ये सियासत के पेच-ओ-ख़म 
पीटिये तालियाँ,किसी ऊँचे शायर का शे'र समझिये

आतिश हो सीनों में चाहे जितनी दफ़न यारों
भड़केगी नहीं, सीली हुई बारूद का बस ढेर समझिये

अपने क़ातिल को लाते हैं ख़ुद सरताज बनाकर
बात इतनी समझिये भले देर-सवेर समझिये

चल रहा है भरम में जीने का चलन कुछ ऐसा
मारिये चीटियाँ और ख़ुद को दिलेर समझिये

इस दौर में जो चाहिए सर-ज़र की सलामती
रखिये शक़ की नज़र औ सेर को सवा सेर समझिये

दुआ होती है क़ुबूल ग़र मर्ज़ी हो ख़ुदा की
इस दिल में ही काशी और अजमेर समझिये

4 टिप्‍पणियां:

  1. आप की ये सुंदर रचना आने वाले सौमवार यानी 18/11/2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है...
    सूचनार्थ।



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  2. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

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  3. आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद..... नेट डिस्टर्ब होने के कारण तत्काल जवाब नहीं दे पाया ......

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