सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

रंग ज़िंदगी के....

गांठें ही गांठें हों जिसमें ऐसे बंधन देख लिए
कांटे ही कांटे हों जिसमें ऐसे दामन देख लिए

प्यार की दिलकश म्यानों में नफ़रत की शमशीर यहाँ
शिफ़ा के नाम पे ज़ख्म कुरेदे ऐसे मरहम देख लिए

उन्स वफ़ा के गुलशन में खिलते फूल अज़ाबों के
तेज़ाबी बारिश के मैंने ऐसे सावन देख लिए

लिखा किताबों में पाया ना मुर्शिद ने बतलाया था
ख़ून बहा दे सीने का अब ऐसे मौसम देख लिए

रिश्तों की लाशों को कैसे नोच नोच के खाते हैं
बिलकुल गिद्ध के जैसे हों ऐसे दुर्जन देख लिए

टूट गए बेआवाज़ वो कब औ ज़र्रा ज़र्रा बिखर गए
मैंने अपने घर के लुटते कितने ऐसे बर्तन देख लिए

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (07-10-2014) को "हमे है पथ बनाने की आदत" (चर्चा मंच:1759) (चर्चा मंच:1758) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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