रविवार, 4 सितंबर 2011

कुछ अपने मन की....



पीड़ा ये आह!

बुझती हर चाह 
नीरव चक्षु
बहते अश्रु,
मन के बवंडर
स्वप्नों के खण्डहर,
संकीर्ण लोग
ऋण व योग,
धुंधले चित्र
मित्र विचित्र, 
पग-पग रण
मन के व्रण,
छल ये भीषण
और विभीषण....
अनजान सा भय
लगे शत्रु समय।
क्या-क्या सहूँ
अब क्या कहूँ;
आवारा सोच को 
सपनों का नाम दूँ
या जीवन वृत्त 
प्रारब्ध मान लूं..... 

2 टिप्‍पणियां:

  1. .

    पग-पग रण
    मन के व्रण,
    छल ये भीषण
    और विभीषण....
    अनजान सा भय
    लगे शत्रु समय ...

    Awesome...

    Great creation..

    .

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